नई दिल्ली के कापसहेड़ा में सरला श्रीवास सोशल कल्चरल रिसर्च फाउंडेशन द्वारा शांति दूत एवं कठपुतली कलाकार सरला श्रीवास की 40वीं जयंती के अवसर पर कठपुतली संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कठपुतली संवाद संस्थान के सचिव एवं कठपुतली कलाकार सुनील कुमार ने की। इस अवसर पर कठपुतली कला के माध्यम से सामाजिक जागरूकता और मानवीय मूल्यों के प्रसार पर चर्चा की गई। संस्था द्वारा लोककला, संस्कृति, नाटक, लोकगीत एवं कठपुतली कला के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर कार्य करने का संकल्प दोहराया गया।
कापसहेड़ा में मनाई गई शांति दूत की जयंती
आज दिनांक 14 अगस्त, शुक्रवार को नई दिल्ली के कापसहेड़ा स्थित सरला श्रीवास सोशल कल्चरल रिसर्च फाउंडेशन द्वारा शांति दूत एवं वरिष्ठ कठपुतली कलाकार सरला श्रीवास की 40वीं जयंती के उपलक्ष्य में कठपुतली संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कठपुतली संवाद संस्थान के सचिव एवं प्रसिद्ध कठपुतली कलाकार सुनील कुमार ने की।

कठपुतली कला को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाने वाली सरला श्रीवास
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सुनील कुमार ने कहा कि भारत की लोककलाएँ हमारी सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर हैं। इन्हीं लोककलाओं में कठपुतली कला एक ऐसी विधा है, जो मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक जागरूकता का प्रभावी माध्यम रही है। उन्होंने कहा कि इस परंपरा को जीवंत रखने वाले प्रेरक व्यक्तित्वों में शांति दूत एवं कठपुतली कलाकार सरला श्रीवास का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।
सुनील कुमार ने बताया कि सरला श्रीवास ने कठपुतली कला को केवल मंचीय प्रदर्शन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे समाज में प्रेम, शांति, भाईचारे और मानवीय मूल्यों के प्रसार का सशक्त माध्यम बनाया। उनके लिए कला केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का एक प्रभावी साधन थी।
समाज सेवा एवं जनजागरण में अहम योगदान
सुनील कुमार ने बताया कि सरला श्रीवास के व्यक्तित्व में सादगी, संवेदनशीलता, सेवा और लोकसंस्कृति के प्रति गहरा समर्पण झलकता था। उन्होंने लोककला के माध्यम से शिक्षा, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, बाल अधिकार, स्वास्थ्य और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जन-जागरण का संदेश दिया। उनकी प्रस्तुतियाँ दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ-साथ उन्हें सोचने और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराती थीं।
उन्होंने कहा कि कठपुतली कला लंबे समय से सामाजिक संदेश पहुँचाने का प्रभावी माध्यम रही है और इसी परंपरा को आगे बढ़ाने की प्रेरणा सरला श्रीवास के कार्यों से मिलती है।
संस्था द्वारा लोककला संरक्षण के प्रयास जारी
कार्यक्रम में बताया गया कि सरला श्रीवास के नाम पर स्थापित सरला श्रीवास सोशल कल्चरल रिसर्च फाउंडेशन द्वारा लोककला, संस्कृति, नाटक, लोकगीत और कठपुतली कला के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए निरंतर कार्य किया जा रहा है। संस्था देश एवं समाज में सांस्कृतिक चेतना, पर्यावरण संरक्षण, अंगदान, देहदान तथा सामाजिक जागरूकता से जुड़े अनेक कार्यक्रम आयोजित कर सरला श्रीवास की प्रेरणा को आगे बढ़ा रही है।

युवा पीढ़ी को प्रेरणा देता सरला श्रीवास का व्यक्तित्व
सरला श्रीवास युवा मंडल की अध्यक्ष सुमन कुमारी ने कहा कि सरला श्रीवास का जीवन हमें यह संदेश देता है कि कला तभी सार्थक होती है, जब वह समाज के जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम बने। उन्होंने बताया कि सरला श्रीवास कठपुतली कला के माध्यम से देश एवं समाज को जोड़ने, जागृत करने और शांति का संदेश देने की सशक्त हस्ताक्षर थीं।
सुमन कुमारी ने कहा कि उनका आदर्श आज भी कलाकारों, युवाओं और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं को लोक परंपराओं के संरक्षण तथा मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए प्रेरित करता है।
कला विरासत को संरक्षित रखने का संकल्प
कार्यक्रम के अंत में सरला श्रीवास की जयंती पर कठपुतली कला, लोककला, लोक संस्कृति और मानवता की इस अमूल्य विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का संकल्प लिया गया। उपस्थित सभी कलाकारों एवं सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने लोक परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।







