भारत की सांस्कृतिक विरासत में लोक कलाओं का विशेष स्थान है। इन्हीं लोक कलाओं में से एक है कठपुतली कला, जो सदियों से मनोरंजन, शिक्षा और सामाजिक संदेशों के प्रसार का माध्यम रही है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में जन्मे सुनील कुमार ने इस पारंपरिक कला को न केवल जीवित रखा है, बल्कि इसे एक नई दिशा और पहचान भी दी है। वे आज बिहार के प्रमुख कठपुतली कलाकारों में गिने जाते हैं।
सुनील कुमार, जिन्हें ‘सुनील सरला’ के नाम से भी जाना जाता है, एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने कठपुतली, गीत-संगीत, अभिनय और नाटक के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का काम किया है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, बाल विवाह, दहेज प्रथा, नशा मुक्ति और आत्महत्या रोकथाम जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के लिए अपनी कला का उपयोग किया। वे केवल एक कलाकार नहीं हैं, बल्कि एक समाज सुधारक, शिक्षक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी हैं।
बिहार में कठपुतली कला को पुनर्जीवित करने में सुनील कुमार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने न केवल इस कला को सीखा, बल्कि इसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का काम भी किया। उनका मानना है कि कठपुतली कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज में बदलाव लाने का एक सशक्त माध्यम भी है। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने जीवन को कला और समाज को समर्पित कर दिया।
सुनील कुमार की कला यात्रा साधारण शुरुआत से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाने तक की एक प्रेरणादायक कहानी है। उन्होंने कठपुतली कला को स्कूलों, कॉलेजों और ग्रामीण क्षेत्रों में लोकप्रिय बनाने के लिए अथक प्रयास किए हैं। उनके द्वारा आयोजित कार्यशालाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हजारों बच्चों और युवाओं ने भाग लिया है और इस कला को सीखा है।
आज के डिजिटल युग में जब पारंपरिक कलाएँ विलुप्त होती जा रही हैं, सुनील कुमार ने कठपुतली कला को आधुनिक शिक्षा और सामाजिक जागरूकता से जोड़कर एक नई पहचान दी है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि कला के प्रति समर्पण और जुनून हो तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती। इस लेख में हम सुनील कुमार के जीवन, उनकी कलात्मक यात्रा, प्रशिक्षण, कार्य अनुभव, सम्मान और समाज में उनके योगदान के बारे में विस्तार से जानेंगे।

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
सुनील कुमार का जन्म 2 जनवरी 1980 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री कृष्णानंदन ठाकुर और माता श्रीमती कांता देवी ने उन्हें बचपन से ही कला और संस्कृति से जुड़े रहने का वातावरण प्रदान किया। उनका पैतृक निवास मालीघाट, पंचमुखी चौक, स्टेट वेयरहाउस के सामने, मुजफ्फरपुर में स्थित है। यह क्षेत्र मुजफ्फरपुर शहर के मध्य में स्थित है और यहाँ की सांस्कृतिक गतिविधियाँ काफी समृद्ध रही हैं।
बचपन से ही सुनील कुमार को गीत-संगीत, अभिनय और नाटकों में गहरी रुचि थी। वे हमेशा से सामाजिक मुद्दों पर अपनी बात रखने और लोगों को जागरूक करने के लिए कला को एक माध्यम के रूप में देखते थे। उनके परिवार ने भी इस रुचि को प्रोत्साहित किया और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनकी इस रुचि ने आगे चलकर उन्हें कठपुतली कला की ओर प्रेरित किया।
सुनील कुमार ने फोटोग्राफी और यात्रा करने में भी विशेष रुचि विकसित की। यात्रा ने उन्हें विभिन्न संस्कृतियों और कलाओं को निकटता से देखने और समझने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने बिहार के अलावा कई अन्य राज्यों की यात्रा की और वहाँ की लोक कलाओं का अध्ययन किया। इस अनुभव ने उनकी कला को और अधिक समृद्ध किया। सुनील कुमार के बचपन की एक और विशेषता यह थी कि वे हमेशा अपने आसपास होने वाली सामाजिक गतिविधियों में भाग लेते थे। उन्हें स्कूल के नाटकों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामाजिक आयोजनों में भाग लेना अच्छा लगता था। इसने उनके अभिनय कौशल को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके परिवार ने हमेशा उनके कलात्मक झुकाव को सम्मान दिया और उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। यही कारण है कि सुनील कुमार आज एक स्थापित कठपुतली कलाकार के रूप में पहचाने जाते हैं।

कठपुतली कला में प्रशिक्षण और शिक्षा
सुनील कुमार ने कठपुतली कला में औपचारिक प्रशिक्षण विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों से प्राप्त किया। उन्होंने किलकारी बाल केंद्र, रोहुआ, मुजफ्फरपुर से अपनी कठपुतली प्रशिक्षण की शुरुआत की। किलकारी बाल केंद्र बिहार में बाल कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। यहाँ उन्होंने कठपुतली कला की बुनियादी तकनीकों को सीखा। इसके बाद उन्होंने प्रमंडल बाल भवन किलकारी, मुजफ्फरपुर से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया।
उनका प्रशिक्षण केवल मुजफ्फरपुर तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने सीतामढ़ी, शिवहर, पूर्वी चंपारण और पश्चिम चंपारण के किलकारी केंद्रों से भी कठपुतली कला का गहन प्रशिक्षण लिया। इस बहुमुखी प्रशिक्षण ने उन्हें कठपुतली कला की विभिन्न शैलियों और तकनीकों में पारंगत किया। उन्होंने कठपुतली बनाने की कला, कठपुतली संचालन, कहानी निर्माण और मंचन तकनीकों में विशेषज्ञता हासिल की।
इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी योग्यता बढ़ाई। उन्होंने जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) रामबाग, मुजफ्फरपुर, डायट विक्रम, पटना और डायट छतौनी, मोतिहारी, पूर्वी चंपारण से विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में कठपुतली कला के उपयोग की नई तकनीकें सिखाईं। सुनील कुमार ने कठपुतली कला के विभिन्न पहलुओं पर गहन अध्ययन किया है। उन्होंने पारंपरिक कठपुतली कला के साथ-साथ आधुनिक तकनीकों को भी सीखा है। इससे उनकी कला में विविधता आई है और वे अलग-अलग आयु वर्ग के दर्शकों को अपनी कला से जोड़ सकते हैं।
उनका यह भी मानना है कि कठपुतली कला को सीखने के लिए धैर्य, समर्पण और अभ्यास की आवश्यकता होती है। वे स्वयं नियमित रूप से अभ्यास करते हैं और अपनी कला को निखारने के लिए निरंतर प्रयासरत रहते हैं।
पेशेवर जीवन और कार्य अनुभव
सुनील कुमार का पेशेवर जीवन अत्यंत विविध और समृद्ध रहा है। उन्होंने अपनी कला को समाज सेवा और शिक्षा के साथ जोड़कर एक अनूठी पहचान बनाई है। उन्होंने विभिन्न संगठनों और संस्थानों के साथ काम किया है और अपनी कला के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया है।
• बिहार शिक्षा परियोजना: वे बिहार शिक्षा परियोजना के अंतर्गत कला जत्था में दलनायक के पद पर कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने सर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा का अधिकार अधिनियम के लिए मुजफ्फरपुर में जागरूकता कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाई। उन्होंने कठपुतली नाटकों के माध्यम से अभिभावकों और बच्चों को शिक्षा के महत्व के बारे में जागरूक किया।
• पर्यावरण संरक्षण: पीपल-नीम-तुलसी अभियान से जुड़कर उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और पौधारोपण के लिए जन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। उन्होंने बोधि वृक्ष कॉरिडोर निर्माण के लिए पदयात्रा भी निकाली। इस पदयात्रा के दौरान उन्होंने लोगों को पेड़ों के महत्व और पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरूक किया।
• छत्तीसगढ़ शासन: उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार के शिक्षा विभाग से जुड़कर गोंडी भाषा के लिए तकनीकी सहयोगी के रूप में सेवा प्रदान की। यह एक महत्वपूर्ण कार्य था क्योंकि गोंडी भाषा छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख आदिवासी भाषा है और इसके संरक्षण और विकास के लिए तकनीकी सहायता की आवश्यकता थी।
• नेहरू युवा केंद्र: युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय के अंतर्गत नेहरू युवा केंद्र से जुड़कर उन्होंने ‘कैच द रेन’ परियोजना के माध्यम से जल संचयन जागरूकता अभियान मुजफ्फरपुर के विभिन्न प्रखंडों में चलाया और युवा मंडलों के गठन में सहयोग किया। इस अभियान के तहत उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण की तकनीकों के बारे में लोगों को जागरूक किया।
• सीजी नेट जन पत्रकारिता: इसके माध्यम से उन्होंने भारत के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भ्रमण कर वैकल्पिक मीडिया के लिए प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने इन क्षेत्रों में कठपुतली नाटकों के माध्यम से शांति, विकास और शिक्षा का संदेश फैलाया।

नाटक निर्देशन और कलात्मक उपलब्धियाँ
सुनील कुमार ने कई महत्वपूर्ण नाटकों का निर्देशन किया है, जिनमें सामाजिक मुद्दों को केंद्र में रखा गया है। उनके निर्देशित नाटक न केवल मनोरंजक हैं, बल्कि समाज में जागरूकता फैलाने का काम भी करते हैं।
• आत्महत्या रोकथाम: उन्होंने आत्महत्या रोकथाम के लिए ‘मैं समझ सकता हूं’ नाटक का निर्देशन किया। यह नाटक मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या की रोकथाम के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए समर्पित था। इस नाटक के माध्यम से उन्होंने लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के महत्व और आत्महत्या के खतरे के बारे में बताया।
• महिला सशक्तिकरण: महिला सशक्तिकरण पर आधारित नाटक ‘नारी नहीं है अबला’ का निर्देशन किया। इस नाटक के माध्यम से उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और उनके सशक्तिकरण का संदेश दिया। इस नाटक में उन्होंने दिखाया कि महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं और उन्हें समान अवसर मिलने चाहिए।
• बकरी प्रबंधन: ‘गरीबों की गाय’ नाटक का निर्देशन कर उन्होंने बकरी पालन के महत्व और उसके प्रबंधन के बारे में ग्रामीणों को जागरूक किया। यह नाटक ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बकरी पालन के योगदान को दर्शाता है।
• दिव्यांग पौधा: कठपुतली नाटक ‘दिव्यांग पौधा’ का निर्देशन किया, जो पर्यावरण संरक्षण और पौधों के महत्व पर केंद्रित था। इस नाटक के माध्यम से उन्होंने लोगों को पेड़-पौधों की देखभाल और पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रेरित किया।
सामाजिक कार्य और जागरूकता अभियान
सुनील कुमार ने अपनी कला के माध्यम से कई महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाई है। उन्होंने कठपुतली, नाटक, गीत-संगीत और अभिनय के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों तक अपनी बात पहुँचाई।
• समाज सुधार अभियान: उन्होंने दहेज प्रथा, बाल विवाह, बाल श्रम और नशा मुक्ति के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। उन्होंने कठपुतली नाटकों के माध्यम से इन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई और लोगों को जागरूक किया।
• संजीवनी संस्थान: इस संस्थान से जुड़कर उन्होंने ‘माई बॉडी माई राइट’, ‘मेरा शरीर यहाँ मेरी मर्जी चलेगी’ और ‘गुड टच-बैड टच’ के लिए मुजफ्फरपुर के विभिन्न स्कूलों में जाकर लगभग 5000 छात्र-छात्राओं को प्रशिक्षित किया। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य बच्चों को उनके शारीरिक अधिकारों के बारे में जागरूक करना और उन्हें बुरे स्पर्श से बचाना था।
• आत्महत्या रोकथाम दिवस: विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर जूरन छपड़ा, मुजफ्फरपुर स्थित आसव हॉस्पिटल में आयोजित समारोह में उन्हें सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उन्होंने आत्महत्या रोकथाम के महत्व पर प्रकाश डाला।
• बक्सर पर्यावरण पदयात्रा: धनसोई से बक्सर तक प्रस्तावित पर्यावरण बचाओ पदयात्रा में उन्होंने गीत-संगीत, अभिनय, नुक्कड़ नाटक और कठपुतली के माध्यम से पर्यावरण जागरूकता फैलाई।

वित्तीय साक्षरता और ग्रामीण विकास
सुनील कुमार ने ग्रामीण क्षेत्रों में वित्तीय साक्षरता और महिला सशक्तिकरण के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किया है।
• आगा खान ग्राम समर्थन कार्यक्रम: इस कार्यक्रम से जुड़कर उन्होंने ‘गोट प्रबंधन’ के लिए गीत-संगीत, नाटक और कठपुतली के माध्यम से बकरी पालकों को प्रशिक्षित किया और महिला सशक्तिकरण के लिए प्रेरित किया। इस कार्यक्रम के तहत उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को बकरी पालन की आधुनिक तकनीकों के बारे में सिखाया।
• एचडीएफसी परिवर्तन: इस पहल से जुड़कर उन्होंने स्वच्छता के लिए प्रेरित करने का कार्य किया। उन्होंने कठपुतली नाटकों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाई।
• अखिल ग्रामीण युवा विकास समिति: मणिफुलकहां, कांटी से जुड़कर उन्होंने ग्रामीण महिलाओं और युवाओं को कठपुतली के माध्यम से वित्तीय साक्षरता प्रदान की। उन्होंने लगभग 2500 लोगों को प्रशिक्षित किया। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य ग्रामीण लोगों को बैंकिंग, बचत, ऋण और बीमा जैसी वित्तीय सेवाओं के बारे में जागरूक करना था।
प्रमुख सम्मान और पुरस्कार
सुनील कुमार को उनकी कला और समाज सेवा के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है। ये सम्मान उनकी कला, समर्पण और समाज सेवा की गुणवत्ता को दर्शाते हैं।
• राष्ट्रीय रंगमंच सम्मान: राष्ट्रीय रंगलोक द्वारा यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया गया। यह सम्मान रंगमंच के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है।
• रंगमंच रत्न श्री सम्मान 2023: राष्ट्रीय रंग लोक द्वारा आयोजित इस सम्मान समारोह में उन्हें 12 फरवरी 2023 को वसंत पैलेस, मुजफ्फरपुर में सम्मानित किया गया। यह सम्मान रंगमंच के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए दिया गया।
• बिहार गौरव सम्मान: बिहार के उप मुख्यमंत्री द्वारा पटना में उन्हें इस सम्मान से विभूषित किया गया। यह बिहार के प्रमुख सम्मानों में से एक है।
• बिहार आइडल सम्मान: बिहार आइडल द्वारा प्रदान किया गया। यह सम्मान बिहार के प्रतिभाशाली कलाकारों को दिया जाता है।
• कर्ण सम्मान: भागलपुर में अंगिका फाउंडेशन द्वारा यह सम्मान प्रदान किया गया। यह सम्मान कला और संस्कृति के क्षेत्र में योगदान के लिए दिया जाता है।
• यादव चंद्र पांडेय सम्मान: गांव जवार, लोक कलाकारों के जनसंगठन द्वारा प्रदान किया गया। यह सम्मान लोक कलाकारों को उनके योगदान के लिए दिया जाता है।
• फेस ऑफ द फेसबुक सम्मान: निर्मल अनुपम फाउंडेशन द्वारा प्रदान किया गया।
• जन औषधि सप्ताह सम्मान: प्रमंडल बाल भवन किलकारी, मुंगेर में प्रधानमंत्री जन औषधि परियोजना के नोडल पदाधिकारी कुमार पाठक एवं प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र, मुंगेर सदर अस्पताल के संचालक राकेश कुमार द्वारा सम्मानित किए गए।
• बक्सर सम्मान (4 अगस्त 2024): धनसोई से बक्सर तक प्रस्तावित पर्यावरण बचाओ पदयात्रा में गीत-संगीत, अभिनय, नुक्कड़ नाटक और कठपुतली के माध्यम से पर्यावरण जागरूकता फैलाने के लिए उन्हें बिहार सेंट्रल स्कूल, बक्सर में सम्मानित किया गया। डॉ. धर्मेन्द्र कुमार, बिपिन कुमार और अनीता यादव ने संयुक्त रूप से उन्हें स्मृति चिन्ह, प्रशस्तिपत्र, सीड बॉल, तुलसी का पौधा और अंगवस्त्र भेंट किए।
• विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस सम्मान: जूरन छपड़ा, मुजफ्फरपुर स्थित आसव हॉस्पिटल में आयोजित समारोह में उन्हें प्रशस्ति पत्र और अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया।
• पटोरी पुस्तक मेला 2025: शाहपुर पटोरी, समस्तीपुर में आयोजित पुस्तक मेले में उन्हें सम्मान प्राप्त हुआ।

स्कूलों में कठपुतली प्रशिक्षण और कार्यशालाएँ
सुनील कुमार ने बिहार के सरकारी स्कूलों में कठपुतली कला और रंगमंच प्रशिक्षण देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने शिक्षा विभाग, टीचर ट्रेनिंग कॉलेज और स्थानीय कलाकारों के सहयोग से यह कार्यक्रम चलाया है।
आदर्श राजकीय उ.म. विद्यालय मालीघाट: इस विद्यालय में आयोजित नाट्य कार्यशाला के निदेशक के रूप में उन्होंने बच्चों को रंगमंच में व्यवहार होने वाली मुद्राओं की जानकारी दी। बच्चों को पर्सनालिटी डेवलपमेंट, वॉइस मॉड्यूलेशन का अभ्यास कराया और व्यवहार में इन कौशलों को उपयोग करने पर प्रकाश डाला, इस कार्यशाला में नाट्य विधा से स्नातकोत्तर सुजीत कुमार ने भी बच्चों को विभिन्न मुद्राओं के महत्व से अवगत कराया। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य बच्चों के व्यक्तिगत विकास को आसान बनाना और उन्हें अन्य व्यक्तियों से अलग दिखने का आत्मविश्वास देना है। सुनील कुमार का मानना है कि कठपुतली कला बच्चों में रचनात्मकता, आत्मविश्वास और संचार कौशल विकसित करने का एक प्रभावी माध्यम है। उन्होंने कई अन्य स्कूलों में भी कठपुतली कला प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन किया है और हजारों बच्चों को इस कला से जोड़ा है।
कठपुतली कला के माध्यम से बदलाव की पहल
सुनील कुमार ने कठपुतली कला को सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम बनाया है। उन्होंने इस कला के माध्यम से कई महत्वपूर्ण संदेश समाज तक पहुँचाए हैं।
• पर्यावरण संरक्षण: उन्होंने पीपल-नीम-तुलसी अभियान के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और पौधारोपण के लिए जन जागरूकता अभियान चलाए। बोधि वृक्ष कॉरिडोर निर्माण के लिए पदयात्रा भी की। इस अभियान के तहत उन्होंने हजारों लोगों को पौधारोपण के लिए प्रेरित किया।
• शिक्षा का अधिकार: बिहार शिक्षा परियोजना के अंतर्गत उन्होंने सर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा का अधिकार अधिनियम के लिए जागरूकता कार्यक्रमों में भाग लिया। उन्होंने कठपुतली नाटकों के माध्यम से अभिभावकों को बच्चों की शिक्षा के महत्व के बारे में बताया।
• वैकल्पिक मीडिया: सीजी नेट जन पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भ्रमण कर वैकल्पिक मीडिया के लिए प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने इन क्षेत्रों में कठपुतली नाटकों के माध्यम से शांति और विकास का संदेश फैलाया।
• जल संचयन: नेहरू युवा केंद्र के ‘कैच द रेन’ परियोजना के माध्यम से उन्होंने जल संचयन जागरूकता अभियान चलाया। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की तकनीकों के बारे में लोगों को जागरूक किया।
• बाल संरक्षण: संजीवनी संस्थान के साथ मिलकर उन्होंने बच्चों के शारीरिक सुरक्षा अधिकारों पर जागरूकता फैलाई। उन्होंने स्कूलों में ‘गुड टच-बैड टच’ कार्यक्रम आयोजित किए और बच्चों को उनके अधिकारों के बारे में बताया।
सुनील कुमार एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अपनी कला को समाज सेवा और शिक्षा का माध्यम बनाया। उन्होंने कठपुतली, नाटक, गीत-संगीत और अभिनय के माध्यम से समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का काम किया है। पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण, बाल संरक्षण, आत्महत्या रोकथाम, वित्तीय साक्षरता और शिक्षा के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनका योगदान अत्यंत सराहनीय है। उन्हें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है, जो उनकी कला और समाज सेवा की गुणवत्ता को दर्शाते हैं। वे बिहार के लोक कलाकारों के लिए एक प्रेरणा हैं। उन्होंने साबित किया है कि एक कलाकार समाज में कितना बड़ा बदलाव ला सकता है।
स्कूलों में कठपुतली प्रशिक्षण और नाट्य कार्यशालाओं के माध्यम से वे नई पीढ़ी को कला और संस्कृति से जोड़ने का काम कर रहे हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम भी हो सकती है। आने वाले समय में सुनील कुमार कठपुतली कला और समाज सेवा के क्षेत्र में और भी ऊँचाइयाँ छूएंगे, ऐसी उम्मीद है। उनकी कला और समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।

