सुप्रीम कोर्ट का फैसला: बुजुर्ग माता-पिता की संपत्ति से बेटा-बहू बेदखल हो सकते हैं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण, सुरक्षा और सम्मान के लिए जरूरी होने पर ट्रिब्यूनल बेटे-बहू को उनकी संपत्ति से बेदखल कर सकता है। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। यह मामला लखनऊ के एक मकान से जुड़ा है, जहां बुजुर्ग महिला को घर से बाहर करना पड़ा था। अदालत ने बुजुर्गों की गरिमा की रक्षा को समाज की जिम्मेदारी बताया।

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने स्पष्ट किया कि अगर किसी बुजुर्ग के भरण-पोषण, सुरक्षा और सम्मान के लिए आवश्यक हो तो संबंधित ट्रिब्यूनल उसकी संपत्ति से बेटे-बहू को बेदखल करने का आदेश दे सकता है।

लखनऊ का मामला

यह मामला लखनऊ के विकास नगर स्थित एक मकान से संबंधित है। मकान के मालिक रवि कांत गुप्ता ने अपने बेटे के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। उनका आरोप था कि बेटे ने उनकी 81 वर्षीय मां यानी अपनी दादी को घर में रहने नहीं दिया और उन्हें घर छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। इसके बाद बुजुर्ग महिला को वृद्धाश्रम जाना पड़ा। गुप्ता ने 5 जून 2022 को जिला मजिस्ट्रेट के सामने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 के तहत आवेदन दिया और बेटे को मकान से बेदखल करने की मांग की।

एसडीएम ने नवंबर 2022 में माना कि मकान रवि कांत गुप्ता की स्व-अर्जित संपत्ति है और बेटे ने दादी को घर में रहने की अनुमति नहीं दी थी। जिला मजिस्ट्रेट ने बेटे को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश दिया। 9 अगस्त 2023 को इस आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और उसकी पत्नी को मकान का कब्जा गुप्ता को सौंपने का निर्देश दिया गया। बेटे-बहू ने इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत अधिकारियों को बेदखली का आदेश देने का अधिकार नहीं है और एसडीएम तथा जिला मजिस्ट्रेट के आदेश रद्द कर दिए। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को गलत बताते हुए उसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक कानून के तहत बने ट्रिब्यूनल के पास जरूरत पड़ने पर बच्चों या रिश्तेदारों को बुजुर्ग की संपत्ति से बाहर करने का अधिकार है। यह अधिकार तभी इस्तेमाल किया जा सकता है जब बेदखली से वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण, संरक्षण और गरिमा को सुनिश्चित करने में मदद मिले। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून के तहत ट्रिब्यूनल वरिष्ठ नागरिक की सुरक्षा और देखभाल सुनिश्चित करने के लिए बेदखली का आदेश दे सकता है।

कोर्ट ने कहा कि किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों को कितना सम्मान, सुरक्षा और गरिमा देता है। बढ़ती उम्र का मतलब उपेक्षा, असुरक्षा या अपमान नहीं होना चाहिए। इसी उद्देश्य से संसद ने 2007 का कानून बनाया है, ताकि वरिष्ठ नागरिकों को जल्दी राहत मिल सके। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 41 का भी उल्लेख किया।

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  • मैं अनामिका गुप्ता, एक पत्रकार हूँ। पिछले 5 वर्षों में मैंने ब्रेकिंग, राजनीति, अपराध, सामाजिक, मनोरंजन, टेक्नोलोजी, खेल, विज्ञान, वित्त एवं निवेश और प्रौद्योगिकी मुद्दों और फीचर स्टोरीज़, हर विधा में काम किया है। जटिल मामलों को सरल भाषा में समझाना मेरी कला है और निष्पक्ष रिपोर्टिंग मेरी पहचान। इस वेबसाइट पर मैं पाठकों तक सच्चाई पहुँचाने का काम करती हूँ।

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