इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी बेटी को सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सहारनपुर की मनीषा त्यागी के मामले में बेसिक शिक्षा अधिकारी के आदेश को रद्द कर दिया। विभाग को आठ सप्ताह में नए सिरे से विचार कर आदेश पारित करने का निर्देश दिया गया है।
शादीशुदा बेटी के अनुकंपा दावे पर फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा पर सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने यह फैसला सहारनपुर की मनीषा त्यागी की याचिका पर दिया।
मनीषा के पिता धर्मवीर सिंह प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक थे। 14 मई 2015 को सेवाकाल के दौरान उनका निधन हो गया। मनीषा ने 17 मई 2016 को नियमानुसार अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। सहारनपुर के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 14 नवंबर 2024 को उनके आवेदन को इस आधार पर खारिज कर दिया कि वह शादीशुदा हैं।
कोर्ट का निर्देश
कोर्ट ने बेसिक शिक्षा अधिकारी के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि विवाह के बाद भी बेटी अपने माता-पिता के परिवार का हिस्सा बनी रहती है। हालांकि, इससे नौकरी का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। संबंधित विभाग को याची की शैक्षिक योग्यता, परिवार की आर्थिक स्थिति, आश्रित होने और पद की उपलब्धता जैसी सभी कानूनी शर्तों के आधार पर नए सिरे से विचार करना होगा। कोर्ट ने प्राधिकारियों को आठ सप्ताह के भीतर स्पष्ट कारणों के साथ नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
अन्य संबंधित फैसले
इसी दौरान एक अन्य मामले में न्यायमूर्ति अनिल कुमार-दशम ने कहा कि मृत सरकारी कर्मचारी की फैमिली पेंशन और सेवा लाभों का हकदार सेवा नियमों से तय होगा, न कि उत्तराधिकार कानून से। निचली अदालतें उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के आधार पर इन लाभों पर अंतिम अधिकार तय नहीं कर सकतीं, एक और फैसले में न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की अदालत ने एटा की अलीगंज तहसील के लेखपाल प्रवेश कुमार को राहत दी। वर्ष 2009 में गबन के आरोप में निलंबित किए गए इस लेखपाल को विभागीय और आपराधिक मामलों में आरोपमुक्त कर दिया गया था। कोर्ट ने निलंबन अवधि का पूरा वेतन और एरियर देने का आदेश दिया।







