मध्य प्रदेश में हजारों शिक्षकों की नौकरी पर मंडरा रहे संकट के बीच नर्मदापुरम से भाजपा सांसद दर्शन सिंह चौधरी ने उनके समर्थन में आवाज उठाई है। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर पुनर्विचार की मांग की है, जिसमें कक्षा 1 से 8 तक के शिक्षकों के लिए टीईटी (पात्रता परीक्षा) को अनिवार्य कर दिया गया है। इस आदेश के बाद प्रदेश के लाखों ऐसे शिक्षक, जो बिना टीईटी पास किए नियुक्त हुए थे, अपनी नौकरी खोने के भय से जूझ रहे हैं।
क्यों अनिवार्य हुई टीईटी और क्या है सुप्रीम कोर्ट का आदेश?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि कक्षा एक से आठवीं तक के शिक्षकों के लिए टीईटी (पात्रता परीक्षा) पास करना अनिवार्य है। यह आदेश उन शिक्षकों पर भी लागू होता है जिनकी नियुक्ति RTE एक्ट लागू होने से पहले राज्य सरकार के तत्कालीन नियमों के तहत हुई थी। कोर्ट के निर्देशानुसार, जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच साल से अधिक का समय शेष है, उन्हें यह परीक्षा अनिवार्य रूप से उत्तीर्ण करनी होगी।
शिक्षा विभाग के अनुसार, प्रदेश में ऐसे शिक्षकों की संख्या डेढ़ लाख से अधिक है, जिनके पास टीईटी प्रमाणपत्र नहीं है। विभाग ने ऐसे शिक्षकों का डेटा एकत्र करना शुरू कर दिया है। संभावना जताई जा रही है कि जुलाई-अगस्त के महीने में यह अनिवार्य परीक्षा आयोजित की जा सकती है। नियमानुसार, शिक्षकों को यह परीक्षा पास करने के लिए दो वर्ष का समय दिया जाएगा, लेकिन यदि वे दो प्रयासों में भी इसे उत्तीर्ण नहीं कर पाते हैं, तो उनकी सेवाएं समाप्त की जा सकती हैं।
सांसद ने केंद्रीय मंत्री से की ये अपील
सांसद दर्शन सिंह चौधरी ने केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखे पत्र में इस फैसले से उत्पन्न असमंजस और चिंता को रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा कि इनमें से कई शिक्षक ऐसे हैं, जो 25 वर्षों से अधिक समय से सेवा में हैं और राज्य में शैक्षणिक परिणामों में सुधार लाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन शिक्षकों की नियुक्ति उस समय के प्रचलित नियमों और प्रावधानों के तहत हुई थी। ऐसे में अचानक टीईटी को अनिवार्य कर देने से उनके करियर पर संकट के बादल छा गए हैं।
सांसद ने केंद्रीय मंत्री से मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने की संस्तुति करने का आग्रह किया है, ताकि लंबे समय से सेवा दे रहे इन शिक्षकों के हितों की रक्षा की जा सके।
शिक्षक संगठनों और नेताओं का विरोध
इस मुद्दे को लेकर पहले भी प्रदेश के कई भाजपा नेताओं और शिक्षक संगठनों ने सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। नेताओं ने प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री को पत्र लिखकर इस आदेश से उपजी भ्रम की स्थिति को दूर करने और शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने की मांग की थी। शिक्षक संगठन इस फैसले के खिलाफ लगातार आवाज उठा रहे हैं और इसे अनुचित बता रहे हैं। उनका कहना है कि वर्षों के अनुभव और समर्पण को नजरअंदाज कर केवल एक परीक्षा के आधार पर उनकी नौकरी से खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए। फिलहाल, सरकार और प्रशासन इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं।
नोट: यह खबर उपलब्ध जानकारी और विभिन्न मीडिया स्रोतों पर आधारित है। समाचार लिखे जाने के समय तक प्राप्त तथ्यों के अनुसार प्रस्तुत किया गया है। स्थिति में बदलाव संभव है और आधिकारिक पुष्टि के बाद अपडेट किया जा सकता है।

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