रविवार, 15 मार्च 2026

कोमा में 13 साल बिताने वाले हरिश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की अनुमति, एम्स में होगी प्रक्रिया शुरू

पिछले 13 साल से कोमा में जीवन बिता रहे गाजियाबाद के हरिश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव इच्छामृत्यु (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हरिश को 2013 में पंजाब विश्वविद्यालय से बीटेक करते समय चौथी मंजिल से गिरने के कारण गंभीर मस्तिष्क चोट लग गई थी, जिसके बाद से वह पूरी तरह से अचेत अवस्था में थे


कोमा में 13 साल बिताने वाले हरिश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु

परिजनों ने दी भावुक विदाई

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 14 मार्च को हरिश को गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन स्थित उनके घर से एम्स दिल्ली ले जाया गया। इस दौरान परिवार ने बेहद भावुक विदाई दी। ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ी लवली ने हरिश के माथे पर चंदन का तिलक लगाया और कहा, "जाओ, अब सबको माफ करके और सबसे माफी मांगकर जाना" हरिश की मां निर्मला देवी ने बेटे का चेहरा सहलाते हुए उसे अंतिम बार प्यार दिया। पिता अशोक राणा ने बताया कि उन्होंने 4,588 दिनों तक बेटे की पीड़ा देखी, लेकिन अब उसे जाने देने का फैसला और भी पीड़ादायक है। परिवार ने इलाज के लिए अपनी संपत्ति तक बेच दी थी, लेकिन हरिश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ

एम्स में कैसे होगी प्रक्रिया?

एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर विभाग में डॉक्टरों की टीम अब जीवन रक्षक प्रणाली (ट्रेकियोस्टोमी और फीडिंग ट्यूब) को धीरे-धीरे हटाएगी। हरिश कोई जानलेवा इंजेक्शन नहीं दिया जाएगा, बल्कि चिकित्सकीय देखरेख में उनके शरीर को प्राकृतिक रूप से समाप्त होने दिया जाएगा। परिवार ने कहा कि वे उन्हें पानी देते रहेंगे और अंतिम संस्कार के लिए पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक घर लाएंगे

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह हार नहीं, बल्कि गहरे करुणा और साहस का कार्य है। अदालत ने 30 दिन की प्रतीक्षा अवधि को भी माफ कर दिया ताकि हरिश को अधिक पीड़ा न झेलनी पड़े। यह देश का पहला मामला है जहां 2018 के कॉमन कॉज फैसले के तहत पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई है

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

हरिश राणा का जन्म दिल्ली में हुआ था। वह एक ऊर्जावान युवा थे, जिन्हें जिम जाने और फुटबॉल खेलने का शौक था . उन्होंने चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक (सिविल इंजीनियरिंग) की पढ़ाई शुरू की . 2013 में वह अपनी डिग्री के अंतिम सेमेस्टर में थे

वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन: 20 अगस्त 2013

20 अगस्त 2013, रक्षाबंधन का दिन था, जब हरिश की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई . चंडीगढ़ में पेइंग गेस्ट (PG) आवास में रह रहे हरिश चौथी मंजिल से गिर गए . इस हादसे में उनके सिर में गंभीर चोट आई, जिससे उनका मस्तिष्क बुरी तरह प्रभावित हुआ . हादसे के बाद उन्हें पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया, जहां 21 से 27 अगस्त 2013 तक उनका इलाज चला। डॉक्टरों ने उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट, एंटी-एपिलेप्टिक दवाएं और ट्रेकियोस्टोमी जैसी चिकित्सा सहायता दी . लेकिन उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और वह कोमा में चले गए। डॉक्टरों ने बताया कि उनकी रिकवरी की संभावना बेहद कम है

चिकित्सा स्थिति और परिवार का संघर्ष

हरिश को क्वाड्रिप्लेजिया नामक गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ा, जिसमें मरीज फीडिंग ट्यूब और वेंटिलेटर पर निर्भर रहता है . डॉक्टरों के अनुसार, उनमें 100% विकलांगता थी और वह बिना किसी बाहरी प्रतिक्रिया के सिर्फ सोने-जागने की अवस्था में थे . हरिश के माता-पिता - पिता अशोक राणा और माता निर्मला देवी - ने 13 साल तक बेटे की सेवा की . उनका पूरा जीवन अस्पताल के गलियारों और ICU तक सीमित हो गया . इलाज के बढ़ते खर्चों के कारण परिवार को दिल्ली के महावीर एनक्लेव स्थित अपना घर बेचना पड़ा और वे गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में एक छोटे से फ्लैट में शिफ्ट हो गए

मां निर्मला हर सुबह-शाम बेटे की मालिश करतीं और उसे घर की कहानियां सुनातीं। कभी-कभी वे घंटों इंतजार करतीं कि शायद उनके बेटे की पलकें झपकें या कोई हरकत हो, जिससे उन्हें यकीन हो कि वह अभी जीवित है . लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहने के कारण हरिश के शरीर पर गहरे बेडसोर (घाव) बन गए, जिनसे उन्हें लगातार संक्रमण का खतरा बना रहता था

कानूनी लड़ाई

हाईकोर्ट में पहली कोशिश

जब हरिश की हालत में कोई सुधार नहीं दिखा, तो परिवार ने जुलाई 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने पैसिव इच्छामृत्यु (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति मांगी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि हरिश वेंटिलेटर पर निर्भर नहीं हैं और बिना बाहरी सहायता के जीवित रह सकते हैं, इसलिए फीडिंग ट्यूब हटाना एक्टिव इच्छामृत्यु की श्रेणी में आएगा, जो भारत में अवैध है .

सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक अनुमति

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दिसंबर 2025 में उन्होंने फिर से याचिका दायर की, जिसमें बताया कि हरिश की हालत और बिगड़ गई है . सुप्रीम कोर्ट ने दो मेडिकल बोर्ड बनाए, जिन्होंने पुष्टि की कि हरिश के ठीक होने की संभावना नगण्य है .

11 मार्च 2026 को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया और हरिश के लिए पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी . कोर्ट ने 30 दिन की प्रतीक्षा अवधि को भी माफ कर दिया, ताकि हरिश को अधिक पीड़ा न झेलनी पड़े 

भारत में इच्छामृत्यु का कानूनी परिप्रेक्ष्य

हरिश राणा का मामला भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। 2011 में अरुणा शानबाग केस में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव इच्छामृत्यु को मान्यता दी थी। अरुणा शानबाग मुंबई के केईएम अस्पताल की नर्स थीं, जिन पर 1973 में हमला हुआ था और वह 42 साल तक कोमा में रहीं .

2018 के कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गरिमा के साथ मरने का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। कोर्ट ने पैसिव इच्छामृत्यु के लिए विस्तृत दिशानिर्देश भी जारी किए .

हरिश राणा का केस पहला ऐसा मामला है जहां सुप्रीम कोर्ट के 2018 के दिशानिर्देशों को लागू किया गया और किसी मरीज के लिए पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई .

अंतिम प्रक्रिया और अंगदान

एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर विभाग में 5-6 डॉक्टरों की टीम अब हरिश के जीवन रक्षक प्रणाली (ट्रेकियोस्टोमी और फीडिंग ट्यूब) को धीरे-धीरे हटाएगी . परिवार ने हरिश के अंगदान की इच्छा जताई है। डॉक्टर पहले सभी अंगों की जांच करेंगे कि कौन से अंग दान के लिए उपयुक्त हैं .

हरिश राणा की कहानी केवल एक चिकित्सा मामला नहीं है, बल्कि एक परिवार के असीम प्रेम, संघर्ष और करुणा की गाथा है, जिसने 13 साल तक हर पल अपने बेटे की पीड़ा को सहा और अंत में उसे शांति से जाने देने का साहस किया

नोट: यह खबर उपलब्ध जानकारी और विभिन्न मीडिया स्रोतों पर आधारित है। समाचार लिखे जाने के समय तक प्राप्त तथ्यों के अनुसार प्रस्तुत किया गया है। स्थिति में बदलाव संभव है और आधिकारिक पुष्टि के बाद अपडेट किया जा सकता है। 

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