उज्जैन के त्रिवेणी हिल्स में रिटायर्ड शिक्षक अशोक कुमार दुबे की आवाज सुनते ही रोज शाम सैकड़ों कौवे पहुंच जाते हैं। कई बार इनकी संख्या एक हजार तक पहुंच जाती है। वह साल 2018 से पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था कर रहे हैं। श्राद्ध पक्ष में यहां खीर, पूड़ी और मीठी नुक्ती भी तैयार की जाती है।
उज्जैन में श्राद्ध पक्ष के दौरान पितरों को तर्पण और श्राद्ध कर्म के बाद कौवों को भोजन कराने की परंपरा है। सिद्धवट और रामघाट जैसे तीर्थों पर देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। शहर में कौवों की संख्या कम होने के बीच इंदौर रोड स्थित त्रिवेणी हिल्स में एक अलग तस्वीर देखने को मिल रही है, रिटायर्ड शिक्षक अशोक कुमार दुबे नवोदय विद्यालय से लेक्चरर पद से रिटायर हुए हैं। वह साल 2018 से लगातार पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था कर रहे हैं। शुरुआत महज 5 से 7 चिड़ियों से हुई थी। धीरे-धीरे कौवे भी आने लगे। पहले संख्या 10-20 हुई, फिर 50 और अब कई बार एक हजार तक पहुंच जाती है।
रोज शाम होती है कौवों की दावत
रोज शाम करीब 6 बजे अशोक दुबे भोजन तैयार करते हैं। उनकी आहट मिलते ही आसपास मौजूद कौवे उड़कर पहुंचने लगते हैं। कुछ ही देर में पूरा इलाका कौवों की आवाज से गूंज उठता है। दाना और पानी मिलने के बाद ये कौवे कुछ समय यहां रुकते हैं और अंधेरा होने से पहले वापस लौट जाते हैं। अशोक के अनुसार मौसम के साथ इनकी संख्या बदलती रहती है। जुलाई से सितंबर के बीच संख्या खास तौर पर बढ़ जाती है। इन दिनों रोजाना 500 से 700 और कई बार करीब एक हजार कौवे तक पहुंच रहे हैं।
इनके लिए रोजाना करीब 10 किलो चावल और 2 किलो परमल का इंतजाम किया जाता है। इस सेवा में कॉलोनी के लोग भी सहयोग करने लगे हैं। अशोक दुबे के अनुसार कौवों के भोजन पर रोज करीब 800 से 1000 रुपये तक खर्च होता है। साल भर में करीब दो लाख रुपये तक की राशि पक्षियों के भोजन पर खर्च हो जाती है।
श्राद्ध पक्ष में खास भोजन
श्राद्ध पक्ष में इन कौवों के लिए भोजन भी खास हो जाता है। खीर, पूड़ी, भजिए और मीठी नुक्ती तैयार की जाती है। पूड़ी को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर खिलाया जाता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा कौवों को भोजन मिल सके। कुछ ही पलों में पूरा भोजन खत्म हो जाता है। अशोक दुबे के अनुसार अब ये पक्षी उनके लिए परिवार और दोस्त जैसे हो गए हैं, हिंदू परंपरा में श्राद्ध के दौरान कौवे को भोजन कराने का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि कौवे के माध्यम से पितरों तक भोजन पहुंचता है। श्राद्ध में पंचबलि की परंपरा के तहत गाय, कुत्ते, कौवे, चींटी और देवताओं को भोजन अर्पित करने का उल्लेख मिलता है।
अशोक दुबे की इस पहल में अब आसपास के लोग भी सहभागी बन गए हैं। शंकर राव जांगड़े और जयसिंह सहित अन्य लोग कौवों के लिए पानी की व्यवस्था करते हैं। आठ साल पहले कुछ चिड़ियों से शुरू हुआ दाना-पानी का यह प्रयास आज सैकड़ों पक्षियों की रोज की जरूरत बन चुका है।







