जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कानूनी दस्तावेजों के माध्यम से पीड़िता की उम्र का निर्धारण संभव है, तो ऑसिफिकेशन टेस्ट (अस्थिभवन परीक्षण) कराना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने यह टिप्पणी सतना जिले में नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए दो आरोपियों की अपील को खारिज करते हुए की।
न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति आरसीएस बिसेन की युगलपीठ ने कहा कि जब पीड़िता की उम्र से संबंधित दो दस्तावेज मौजूद हैं, जो घटना के समय उसकी उम्र 16 वर्ष से कम होने की पुष्टि करते हैं, तो ऑसिफिकेशन टेस्ट की आवश्यकता नहीं रह जाती।
दस्तावेजों की प्रधानता पर कोर्ट का जोर
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की उम्र निर्धारण के लिए उपलब्ध दस्तावेजों पर भरोसा करना सही किया। युगलपीठ ने कहा कि इन दस्तावेजों के आधार पर पीड़िता की उम्र का पता लगाया जा सकता है, इसलिए इस मामले में ऑसिफिकेशन टेस्ट अनिवार्य नहीं था। दोषी ठहराए गए कैलाश कोल और कमलेश ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया था कि डॉक्टर ने पीड़िता की मेडिकल जांच के दौरान ऑसिफिकेशन टेस्ट कराने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि एक्स-रे रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता की उम्र 17 से 18 वर्ष के बीच थी, इसलिए उसे 18 वर्ष से अधिक माना जाना चाहिए।
कब अनिवार्य होता है ऑसिफिकेशन टेस्ट?
हाईकोर्ट की युगलपीठ ने स्पष्ट किया कि ऑसिफिकेशन टेस्ट केवल उन मामलों में आवश्यक हो जाता है, जहां किशोर न्याय (बाल देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 94 के तहत निर्धारित दस्तावेज उपलब्ध नहीं होते हैं। यह परीक्षण एक फोरेंसिक मेडिकल प्रक्रिया है, जिसमें हड्डियों के विकास और उनके आपस में जुड़ने के स्तर के आधार पर व्यक्ति की उम्र का अनुमान लगाया जाता है। यह टेस्ट आमतौर पर कलाई, कोहनी या कॉलर बोन का एक्स-रे लेकर किया जाता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि डॉक्टर की सलाह के बावजूद पुलिस द्वारा यह टेस्ट न करवाने से मामले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, यदि अन्य विधिक दस्तावेज उपलब्ध हों।
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