राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो द्वारा इकबाल मैदान का नाम बदलने की मांग किए जाने के बाद भोपाल में राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे समाज को बांटने वाली राजनीति करार दिया है।
भोपाल में एक बार फिर नामकरण को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य प्रियंक कानूनगो के बयान के बाद इकबाल मैदान का मुद्दा गरमा गया है। यह विवाद अब सिर्फ एक मैदान के नाम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इतिहास, पहचान और विचारधारा के टकराव का रूप लेता जा रहा है।
कांग्रेस ने साधा निशाना
प्रियंक कानूनगो के बयान पर कांग्रेस ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने इस मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कहा कि कब तक नाम बदलने की राजनीति चलेगी। उन्होंने कहा कि जनता महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों से जूझ रही है, लेकिन ध्यान भटकाने के लिए ऐसे विवाद खड़े किए जा रहे हैं। कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा कि अल्लामा इकबाल ने ही 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा' जैसे तराने लिखे हैं। उनके नाम पर सियासत करने वालों पर निशाना साधते हुए इसे 'घटिया राजनीति' बताया गया।
क्या है इकबाल मैदान का इतिहास
इकबाल मैदान भोपाल के सदर मंजिल के सामने स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है। पुराने समय में यहां खिरनी के पेड़ बड़ी संख्या में होते थे, जिस कारण इसे 'खिरनी वाला मैदान' कहा जाता था। जानकारों के अनुसार, मशहूर शायर अल्लामा इकबाल 1931 से 1936 के बीच चार बार भोपाल आए और यहां करीब छह महीने रहे। इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण रचनाएं कीं। बताया जाता है कि उनकी 14 प्रसिद्ध नज्में भोपाल में ही लिखी गईं, जिन्हें बाद में 'जर्ब-ए-कलीम' में शामिल किया गया। बाद में प्रशासन ने इस मैदान का नाम बदलकर इकबाल मैदान कर दिया।
अल्लामा इकबाल कौन थे
अल्लामा मुहम्मद इकबाल का जन्म 1877 में सियालकोट में हुआ था। वे उर्दू और फारसी के महान शायर तथा दार्शनिक थे। उनकी प्रमुख कृतियों में 'बांग-ए-दरा', 'इसरार-ए-खुदी', 'शिकवा' और 'जवाब-ए-शिकवा' शामिल हैं। 21 अप्रैल 1938 को लाहौर में उनका निधन हुआ। उन्हें 'शायर-ए-मशरिक' और पाकिस्तान का आध्यात्मिक पिता भी कहा जाता है। यह मामला अब आने वाले समय में और गरमाने के संकेत दे रहा है। फिलहाल, सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।
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