सोमवार, 16 मार्च 2026

भोपाल गैस त्रासदी: जहरीली राख में मरकरी की मौजूदगी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने HC जाने को कहा

दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े जहरीले कचरे के निपटान के मामले में एक महत्वपूर्ण सुनवाई करते हुए पीड़ित पक्ष के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था 'भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति' को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का रुख करने को कहा। दरअसल, याचिकाकर्ता ने यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री स्थल से निकले जहरीले कचरे को जलाए जाने के बाद बची राख (रिसीडुअल ऐश) में मरकरी (पारा) जैसी भारी धातुओं की मौजूदगी और उसके सुरक्षित निस्तारण को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे।


भोपाल गैस त्रासदी: जहरीली राख में मरकरी की मौजूदगी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने HC जाने को कहा


पीड़ पक्ष ने उठाए राख निस्तारण पर सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने अदालत को बताया कि पिथमपुर स्थित संयंत्र में करीब 337 मीट्रिक टन जहरीले कचरे को जलाए जाने के बाद करीब 900 मीट्रिक टन जहरीली राख बची है। इस राख के निस्तारण को लेकर चिंता जताई गई कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2025 में मानव बस्ती से महज 500 मीटर की दूरी पर इस राख को डालने की सरकारी योजना को खारिज कर दिया था और वैकल्पिक सुरक्षित स्थल तलाशने का निर्देश दिया था।

हालांकि, पीड़ित पक्ष का कहना है कि हाई कोर्ट ने 10 दिसंबर 2025 के अपने आदेश में इस फैसले पर स्थगन (स्टे) लगा दिया। उनका तर्क है कि बिना किसी नए विशेषज्ञ अध्ययन या परिस्थितियों में बदलाव के दिए गए इस आदेश ने निस्तारण प्रक्रिया की न्यायिक निगरानी को प्रभावी रूप से खत्म कर दिया है।

मरकरी के आंकड़ों में बड़ी विसंगती

सुनवाई के दौरान सबसे गंभीर मुद्दा यूनियन कार्बाइड के कचरे में मरकरी की मौजूदगी से जुड़ा रहा। अदालत में पेश याचिका में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की 2015 और 2025 की रिपोर्टों के बीच बड़ी विसंगति बताई गई। याचिका के अनुसार, सीपीसीबी की 2015 की रिपोर्ट में इस कचरे में 904 मिलीग्राम/किग्रा तक मरकरी की उच्च सांद्रता दर्ज की गई थी। इस आधार पर, 337 मीट्रिक टन कचरे में अनुमानित 49 से 221 किलोग्राम तक मरकरी होनी चाहिए थी। लेकिन 2025 की रिपोर्ट में "अकथनीय रूप से" मरकरी का पता नहीं चलने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि वैज्ञानिक रूप से मरकरी गायब नहीं हो सकती। उन्होंने आशंका जताई कि यह या तो पर्यावरण में भारी मात्रा में लीक हो गई है या फिर जांच प्रक्रिया में खामी रही है।

आईआईटी हैदराबाद के प्रोफेसर आसिफ कुरैशी के अध्ययन का हवाला देते हुए कहा गया कि ट्रायल रन के दौरान चिमनी से मरकरी उत्सर्जन रोकने के लिए रसायनों का इस्तेमाल किया गया, जिससे रीडिंग तो साफ आई, लेकिन वह जहर बची हुई राख में ही समा गया। उन्होंने 'मास बैलेंस' विश्लेषण की अनिवार्यता पर जोर दिया, जिससे यह पता चल सके कि आखिर मरकरी गई कहां।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

इन तमाम तर्कों को सुनने के बाद, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता एनजीओ को निर्देश दिया कि वह अपनी सभी चिंताओं और आपत्तियों को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का रुख करे। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट इन याचिकाओं पर बड़े जनहित को ध्यान में रखते हुए योग्यता के आधार पर शीघ्रता से सुनवाई करे और उचित आदेश पारित करे।

नोट: यह खबर उपलब्ध जानकारी और विभिन्न मीडिया स्रोतों पर आधारित है। समाचार लिखे जाने के समय तक प्राप्त तथ्यों के अनुसार प्रस्तुत किया गया है। स्थिति में बदलाव संभव है और आधिकारिक पुष्टि के बाद अपडेट किया जा सकता है। 

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