नागपुर हाईकोर्ट का अनोखा फैसला: मराठी न आने पर मिली जमानत, लेकिन झूठ बोलने पर खारिज

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने एक ड्रग्स मामले में ओडिशा के आरोपी को इसलिए जमानत दे दी क्योंकि उसे मराठी भाषा नहीं आती थी। कोर्ट ने कहा कि भाषा की बाधा के कारण वह अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रभावी इस्तेमाल नहीं कर पा रहा था। हालांकि, अदालत ने एक अन्य मामले में मराठी न आने का झूठा दावा करने वाले आरोपी की जमानत खारिज कर दी।

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने हाल ही में एक ड्रग्स मामले में ओडिशा के रहने वाले आरोपी को जमानत देते हुए अहम टिप्पणी की है। अदालत ने माना कि आरोपी को मराठी भाषा नहीं आती है, जिसके कारण वह अपने खिलाफ लगे आरोपों को ठीक से नहीं समझ पा रहा था और अपने बचाव की प्रभावी तैयारी नहीं कर सका। कोर्ट ने इसे केवल भाषाई समस्या नहीं, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से जुड़ा गंभीर मुद्दा माना।

संविधान के अधिकार को तकनीकी प्रक्रिया पर दी प्राथमिकता

अपने आदेश में कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि संविधान द्वारा प्रत्येक आरोपी को दिए गए अधिकार कानून की तकनीकी प्रक्रियाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति स्थानीय भाषा नहीं समझ पाता, तो उसके निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर असर पड़ता है। इसी आधार पर आरोपी को राहत दी गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि हर आरोपी को यह अधिकार है कि वह अपने खिलाफ लगे आरोपों को पूरी तरह समझे और अपना पक्ष प्रभावी तरीके से रख सके। भाषा इस अधिकार में बाधा नहीं बन सकती।

जब मराठी न आने का दावा पड़ गया उल्टा

गौरतलब है कि इसी अदालत में पहले एक और मामला सामने आया था, जिसमें हत्या के आरोपी ने भी मराठी नहीं जानने का दावा कर जमानत की कोशिश की थी। लेकिन पुलिस ने अदालत में उसकी 10वीं कक्षा की मार्कशीट पेश कर दी, जिसमें उसने मराठी विषय में सबसे अधिक अंक हासिल किए थे। इसके बाद अदालत ने आरोपी का दावा झूठा मानते हुए उसकी जमानत याचिका तुरंत खारिज कर दी।

दो मामलों ने दिया अलग संदेश

इन दोनों मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अदालत भाषा के नाम पर किसी को स्वतः राहत नहीं देती। जहां वास्तव में आरोपी भाषा न समझ पाने के कारण अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग नहीं कर पा रहा था, वहां उसे जमानत मिली। वहीं, जहां भाषा को केवल एक कानूनी हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की गई, वहां अदालत ने सख्त रुख अपनाया। इस फैसले ने एक बार फिर इस बहस को जन्म दिया है कि न्याय सिर्फ कानून की किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर आरोपी को अपनी भाषा में आरोप समझने और अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर मिलना भी उतना ही जरूरी है।

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  • इसरत फातिमा 7 वर्षों के अनुभव वाली एक पेशेवर पत्रकार और कंटेंट राइटर हैं। वह राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समाचार, राजनीति, व्यवसाय, शेयर बाजार, क्रिप्टोकरेंसी, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन और सरकारी योजनाओं सहित विभिन्न विषयों पर शोध-आधारित लेख लिखती हैं। उनका उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय जानकारी सरल भाषा में पहुँचाना है।