कोल्ड्रिफ कफ सिरप कांड में 19 बच्चों की मौत के बाद भी परासिया सिविल अस्पताल में स्थायी शिशु रोग विशेषज्ञ की नियुक्ति नहीं हो सकी है। सरकार ने छह संविदा डॉक्टरों की पोस्टिंग की, लेकिन किसी ने कार्यभार नहीं ग्रहण किया। प्रदेश में शिशु रोग विशेषज्ञों के 958 पदों में से 554 (लगभग 58%) रिक्त हैं।
परासिया अस्पताल में बरकरार है डॉक्टरों की किल्लत
परासिया सिविल अस्पताल में पिछले साल नवंबर से स्थायी शिशु रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं है। यह वही अस्पताल है, जहां कथित रूप से दूषित कोल्ड्रिफ कफ सिरप के सेवन से 19 बच्चों की मौत हो गई थी। इस मामले में पूर्व में तैनात बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण सोनी को विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने गिरफ्तार किया था, जबकि डॉ. अमन सिद्दीकी और सेवानिवृत्त डॉ. एस.एस. ठाकुर को भी हिरासत में लिया गया था। तीनों अभी न्यायिक हिरासत में हैं।
स्थिति यह है कि न केवल सरकारी, बल्कि निजी तौर पर भी परासिया में कोई स्थायी शिशु रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं है। इसका सीधा असर गंभीर रूप से बीमार बच्चों के इलाज पर पड़ रहा है, जिन्हें आपात स्थिति में 30 किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा या करीब 150 किलोमीटर दूर नागपुर ले जाना पड़ता है।
विधानसभा में उठा सवाल, सरकार ने स्वीकार की कमी
परासिया से कांग्रेस विधायक सोहनलाल वाल्मीक ने विधानसभा में इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने बताया कि 7 मई 2026 को स्थायी शिशु रोग विशेषज्ञ की नियुक्ति की मांग को लेकर धरना भी दिया गया था। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने छिंदवाड़ा जिला अस्पताल के दो विशेषज्ञों को सप्ताह में तीन दिन परासिया भेजने की व्यवस्था की, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने सदन में स्वीकार किया कि परासिया सिविल अस्पताल में अभी तक स्थायी शिशु रोग विशेषज्ञ नहीं आया है। उन्होंने बताया कि अप्रैल 2026 में स्वास्थ्य संचालनालय ने एक शिशु रोग विशेषज्ञ सहित छह संविदा डॉक्टरों की पोस्टिंग की थी, लेकिन उनमें से किसी ने भी कार्यभार ग्रहण नहीं किया। सरकार का कहना है कि रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया जारी है, हालांकि इसकी कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है।
प्रदेश में 58% पद खाली, बाल स्वास्थ्य पर संकट
परासिया की समस्या पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में गहरी खामी को उजागर करती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश में शिशु रोग विशेषज्ञ (पीडियाट्रिशियन) के कुल 958 स्वीकृत पदों में से केवल 404 पर डॉक्टर कार्यरत हैं। यानी 554 पद, जो कुल का करीब 58 प्रतिशत है, रिक्त हैं। विशेषज्ञों की इस भारी कमी का असर प्रदेश के दूरदराज के इलाकों में बच्चों को मिलने वाली चिकित्सा सेवाओं पर साफ देखा जा सकता है।







