भारतीय संसद के इतिहास में 17 अप्रैल 2026 एक ऐतिहासिक दिन रहा, जब लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का संविधान संशोधन विधेयक सदन में हार गया। यह पहली बार था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में कोई संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सका। सरकार ने इस विधेयक के माध्यम से 2029 के चुनावों से पहले महिला आरक्षण कानून को लागू करने और परिसीमन प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव रखा था। आइए, इस महत्वपूर्ण मुद्दे को विस्तार से समझते हैं, क्या था विधेयक में, क्यों हुआ विरोध, और आगे क्या होगा?
लोकसभा क्या है?
लोकसभा भारत की द्विसदनीय संसद का निचला सदन है। ‘लोक सभा’ शब्द का अर्थ ‘लोगों का सदन’ है। इसके सदस्य सीधे देश के नागरिकों द्वारा चुने जाते हैं और इसका कार्यकाल 5 वर्षों का होता है। लोक सभा का नाम ही ‘लोक सभा’ है, जिसे अंग्रेजी में House of the People कहा जाता है। लोकसभा संविधान के अनुच्छेद 79 से 122 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करती है। यह सदन धन विधेयक पारित करने और सरकार की नीतियों पर नियंत्रण रखने में सर्वोच्च अधिकार रखता है। लोकसभा के सदस्यों की संख्या सीधे तौर पर देश की जनसंख्या को प्रतिबिंबित करती है, हालांकि 1976 के परिसीमन फ्रीज के कारण यह संख्या वर्षों से 543 पर स्थिर है।
लोकसभा अध्यक्ष
लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही का संचालन करता है और अनुशासन बनाए रखता है। अध्यक्ष का चुनाव सदन के सदस्य स्वयं करते हैं और वह यह तय करते हैं कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं। अध्यक्ष सदन में सदस्यों की अयोग्यता से संबंधित मामलों पर भी निर्णय लेता है। यह पद भारत की वरीयता क्रम में छठे स्थान पर आता है, जो इसकी सर्वोच्चता को दर्शाता है। अध्यक्ष की भूमिका निष्पक्ष और पार्टी-निरपेक्ष होती है, हालांकि वह सदन का सदस्य होता है। अध्यक्ष को सदन से ही वेतन और भत्ते मिलते हैं, जो संसद द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।

वर्तमान में लोकसभा सीट कितनी है?
वर्तमान में लोकसभा की कुल सीटें 543 हैं। संविधान के अनुसार लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 550 निर्धारित की गई थी, जिसमें राज्यों से 530 और केंद्रशासित प्रदेशों से 20 सदस्य शामिल थे। लेकिन 1976 के परिसीमन के बाद से यह संख्या 543 पर स्थिर है। एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए नामांकित दो सीटें अब समाप्त हो चुकी हैं। 1976 में लागू किए गए संवैधानिक फ्रीज के कारण सीटों का पुनर्वितरण और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण रुका हुआ था। अब सरकार इस फ्रीज को हटाना चाहती थी ताकि जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। यह फ्रीज 2001 तक के लिए था, लेकिन बाद में 2026 तक बढ़ा दिया गया था।
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026: क्या था प्रस्ताव?
अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार ने संसद के विशेष सत्र में तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026, परिसीमन विधेयक, 2026, और संघ राज्य क्षेत्र कानून (संशोधन) विधेयक, 2026। इन विधेयकों का उद्देश्य महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023) को 2029 के चुनावों से पहले लागू करना था। सरकार ने इस विधेयक को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे बड़ा संवैधानिक सुधार बताया था। इस विधेयक को पेश करने से पहले कैबिनेट ने मार्च 2026 में ही अपनी मंजूरी दे दी थी।
प्रस्ताव के मुख्य बिंदु:
वर्तमान 543 सीटों को बढ़ाकर 816 (अधिकतम 850) करने की योजना थी। इसमें राज्यों से 815 सीटें और केंद्रशासित प्रदेशों से 35 सीटें रखने का प्रस्ताव था। महिला आरक्षण के तहत कुल सीटों का 33% (लगभग 272 सीटें) महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव था। 1976 का वह फ्रीज हटाया जाना था जिसने सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगाई थी। सरकार का दावा था कि प्रत्येक राज्य की सीटों में 50% की समान वृद्धि होगी और किसी भी राज्य का प्रतिनिधित्व नहीं घटेगा।
सरकार ने स्पष्ट किया कि 2011 की जनगणना परिसीमन के लिए बाध्यकारी नहीं होगी, जिससे दक्षिणी राज्यों की चिंता कम करने की कोशिश की गई। यदि विधेयक पारित होता तो विधानसभा सीटें 4,123 से बढ़कर 6,186 हो जातीं। विधेयक में संविधान के 7 अनुच्छेदों (55, 81, 82, 170, 332, 334A) में संशोधन का प्रस्ताव था। इनमें सबसे महत्वपूर्ण था राष्ट्रपति चुनाव में इलेक्टोरल कॉलेज के गठन में बदलाव और लोकसभा तथा विधानसभाओं की सीटों के पुनर्वितरण का प्रावधान।

17 अप्रैल 2026: विधेयक क्यों हारा?
17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में इस विधेयक पर वोटिंग हुई। विधेयक को पारित होने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी। वोटिंग के दौरान कुल 528 सदस्यों ने मतदान में भाग लिया। विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े जबकि विरोध में 230 वोट आए। पारित होने के लिए 352 वोट चाहिए थे (528 का दो-तिहाई), लेकिन सरकार 54 वोटों से पिछड़ गई। यह प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में पहली बार था जब कोई संविधान संशोधन विधेयक सदन में हारा। विधेयक हारने के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अन्य दो विधेयकों को आगे न बढ़ाने की घोषणा कर दी। इस हार ने सरकार की राजनीतिक ताकत पर सवाल खड़े कर दिए और विपक्ष को एकजुट होने का मौका दिया।
विपक्ष की चिंताएं: दक्षिणी राज्यों को क्यों था डर?
विपक्षी दलों ने इस विधेयक का विरोध मुख्य रूप से परिसीमन के मुद्दे पर किया। दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश) को चिंता थी कि जनसंख्या-आधारित परिसीमन से उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है, क्योंकि इन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने कहा कि तमिलनाडु की 39 सीटें 58 होने के बजाय 46 रह जाएंगी, जबकि उत्तर प्रदेश 80 से बढ़कर 140 हो जाएगा। दक्षिणी राज्यों का तर्क था कि जनसंख्या नियंत्रण में सफलता को “प्रगति को सजा” देने जैसा होगा।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा कि इससे “राजनीतिक अन्याय” होगा। विपक्ष का आरोप था कि इस विधेयक से उत्तर भारत के राज्यों (विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार) की संसदीय ताकत बढ़ेगी और दक्षिणी राज्यों का प्रभाव घटेगा। इससे उत्तर-दक्षिण की बढ़ती खाई और गहरी होने की आशंका थी।
विपक्षी नेताओं (राहुल गांधी, एम.के. स्टालिन) ने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन करना चाहती है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे “संविधान में बिना सलाह के बदलाव” करार दिया। रेवंत रेड्डी ने वैकल्पिक मॉडल सुझाया – 50% सीटें प्रो-रेटा और 50% राज्यों के आर्थिक योगदान के आधार पर आवंटित की जाएं। ओबीसी और मुस्लिम महिलाओं के लिए उप-आरक्षण की भी मांग उठी।

सरकार का आश्वासन और अमित शाह का बयान
सरकार ने विपक्ष की चिंताओं को दूर करने की कोशिश की। गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सभी राज्यों की सीटों में 50% की समान वृद्धि होगी। उन्होंने आंकड़े पेश करते हुए कहा कि पाँच दक्षिणी राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जाएंगी, और उनका प्रतिशत 23.76% से बढ़कर 23.97% हो जाएगा।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस प्रक्रिया से किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा। सरकार ने स्पष्ट किया कि 2011 की जनगणना परिसीमन के लिए बाध्यकारी नहीं होगी। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि दक्षिणी राज्यों को गुमराह करने की कोशिशें हो रही हैं और विधेयक में हर राज्य, क्षेत्र और समुदाय का ध्यान रखा गया है। पीएम मोदी ने सभी राजनीतिक दलों से महिला आरक्षण लागू करने के लिए सहमति बनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण से देश का विकास तेज होगा और यह भारतीय लोकतंत्र के लिए गर्व की बात होगी।
विधेयक हारने के बाद की स्थिति
विधेयक हारने के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मची है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने इसे “भारतीय इतिहास का स्वर्णिम दिन” बताया और विपक्षी एकता को इस जीत का कारण बताया। उन्होंने राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को इस सफलता का श्रेय दिया। विधेयक हारने के बाद सरकार ने अन्य दो विधेयकों को आगे न बढ़ाने की घोषणा की।
कांग्रेस ने 543 सीटों को अगले 25 वर्षों के लिए फ्रीज करने और मौजूदा सीटों के आधार पर महिला आरक्षण लागू करने की मांग की है। तमिलनाडु विधानसभा ने भी इसी तरह का प्रस्ताव पारित किया है। द्रविड़ दलों और क्षेत्रीय दलों ने इस विधेयक के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। कांग्रेस ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह महिला आरक्षण को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहती है।

सरकार की नई कोशिशें: आगे क्या?
विधेयक हारने के बाद सरकार ने हार नहीं मानी है। सरकार विपक्षी दलों से बातचीत कर रही है। किरेन रिजिजू ने राहुल गांधी से लगभग 50 मिनट की बैठक की। सरकार एक नए संशोधित ड्राफ्ट पर काम कर रही है, जिसमें संभवतः 1971 की जनगणना को आधार बनाकर सीटों का अनुपात बनाए रखने का प्रस्ताव हो सकता है, जबकि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन किया जाएगा।
कांग्रेस ने भी सहमति जताई है कि वह 543 सीटें फ्रीज करने और महिला आरक्षण मौजूदा सीटों पर लागू करने को तैयार है। सरकार का लक्ष्य 2029 के चुनावों से पहले महिला आरक्षण लागू करना है। हालांकि, 16 से 18 अगस्त 2026 के विशेष सत्र की अटकलों को सरकार ने खारिज कर दिया है। अब यह देखना होगा कि सरकार विपक्ष से किस तरह सहमति बनाती है और क्या यह ऐतिहासिक बदलाव 2029 के चुनावों से पहले लागू हो पाता है या नहीं।
लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने और 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का ऐतिहासिक प्रस्ताव 17 अप्रैल 2026 को संसद में पारित नहीं हो सका। 298 पक्ष और 230 विपक्ष के वोटों के साथ, सरकार 54 वोटों से दो-तिहाई बहुमत से चूक गई। दक्षिणी राज्यों को डर था कि जनसंख्या-आधारित परिसीमन से उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है, जबकि सरकार ने 50% समान बढ़ोतरी और 2011 जनगणना को बाध्यकारी न बनाने का आश्वासन दिया।
विधेयक हारने के बाद सरकार ने अन्य विधेयकों को आगे नहीं बढ़ाया, जबकि कांग्रेस ने 543 सीटें फ्रीज करने की मांग उठाई है। अब यह देखना होगा कि सरकार 2029 के चुनावों से पहले महिला आरक्षण लागू करने की अपनी योजना को किस दिशा में आगे बढ़ाती है। यह विधेयक भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था और आने वाले महीनों में इस पर और बहस होगी।







