दिल्ली का जंतर-मंतर, जो ऐतिहासिक रूप से शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों का केंद्र रहा है, एक बार फिर से देश के युवाओं के आक्रोश का प्रमुख स्थल बन गया है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में यह प्रदर्शन पिछले कई दिनों से जारी है और इसने न केवल राष्ट्रीय राजधानी बल्कि पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस आंदोलन का मूल मुद्दा शिक्षा प्रणाली में बढ़ती अनियमितताएं, विशेष रूप से NEET-UG जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं हैं, जिनके कारण लाखों विद्यार्थियों का भविष्य अधर में लटक गया है।
यह प्रदर्शन 20 जून 2026 को शुरू हुआ था, और धीरे-धीरे यह एक बड़े जन आंदोलन का रूप लेता जा रहा है। CJP का कहना है कि वे तब तक नहीं हटेंगे जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं दे देते और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता नहीं आती। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार परीक्षाओं में पारदर्शिता लाने में विफल रही है।
28 जून 2026 को प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक उनके साथ जुड़ गए और उन्होंने अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया। उनके जुड़ने से इस मुद्दे को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। 20 दिनों के उपवास के बाद उनका वजन 9 किलोग्राम से अधिक कम हो गया था।
हालांकि, इस विरोध-प्रदर्शन ने 20 जुलाई 2026 को एक नाटकीय मोड़ लिया, जब प्रदर्शनकारियों ने ‘संसद चलो’ मार्च निकाला और पुलिस के साथ उनकी झड़प हो गई। इस हिंसक टकराव में 118 पुलिसकर्मी और कई प्रदर्शनकारी घायल हो गए। पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले दागे। इस घटना के बाद यह मुद्दा केवल शिक्षा व्यवस्था के सुधार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सरकार के खिलाफ एक बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभर कर सामने आया।

क्या है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) और इस आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई?
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) एक व्यंग्यात्मक राजनीतिक मंच है, जिसका नाम भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दी गई एक विवादास्पद टिप्पणी से प्रेरित है। CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके हैं। यह आंदोलन मई 2026 में NEET-UG परीक्षा रद्द होने के बाद सोशल मीडिया पर तेजी से फैला।
CJP ने अपने आंदोलन की शुरुआत 20 जून 2026 को जंतर-मंतर से की थी। उनकी प्रमुख मांगें हैं:
पहली, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का तत्काल इस्तीफा। दूसरी, NEET पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा। तीसरी, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR वापस लेना और भविष्य में ऐसी FIR न दर्ज करने की गारंटी।
20 जुलाई 2026: ‘संसद चलो’ मार्च और पुलिस का बैटनचार्ज-पूरी घटना
20 जुलाई 2026 को CJP ने ‘संसद चलो’ मार्च का आह्वान किया, जो संसद के मानसून सत्र के पहले दिन पड़ रहा था। देश भर से हजारों युवा, छात्र, अभिभावक और शिक्षक इस मार्च में शामिल होने के लिए जंतर-मंतर पर एकत्रित हुए। दिल्ली पुलिस ने पहले ही धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लगा दी थी और प्रदर्शनकारियों को संसद की ओर मार्च करने की अनुमति नहीं दी गई थी। भारी संख्या में पुलिस बल, अर्धसैनिक बल और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) को जंतर-मंतर और उसके आसपास तैनात कर दिया गया था।
सुबह लगभग 9 बजे, CJP संस्थापक अभिजीत दीपके और सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व किया। जैसे ही प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स तोड़कर संसद की ओर बढ़ने की कोशिश की, पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया।
इस झड़प में पुलिस के अनुसार 118 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें से 6-7 गंभीर रूप से घायल हुए। प्रदर्शनकारियों में भी कई घायल हुए। पुलिस ने दावा किया कि प्रदर्शनकारी उग्र हो गए थे, पत्थरबाजी कर रहे थे और पुलिस पर स्लिपर, पेपर स्प्रे फेंक रहे थे। वहीं प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाया, पुलिस ने अपने बयान में कहा कि प्रदर्शन को पेशेवर तरीके से संभाला जा रहा है और किसी भी हिंसा या हिरासत की खबरों को अफवाह बताया।

पुलिस कार्रवाई के बाद भी नहीं रुका आंदोलन
पुलिस ने 20 जुलाई की शाम को जंतर-मंतर से स्टेज, टेंट और अन्य ढांचे हटा दिए, लेकिन प्रदर्शनकारी 21 जुलाई की सुबह फिर से वहां एकत्रित हो गए। बैटनचार्ज के बावजूद प्रदर्शनकारियों का हौसला कम नहीं हुआ, बल्कि इस घटना ने और अधिक लोगों को आंदोलन से जोड़ दिया।
रात भर भारी बारिश के बावजूद प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर डटे रहे। CJP ने दावा किया कि हजारों-हजार प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर मौजूद हैं। स्थानीय लोगों ने खाना, पानी, जूस और अन्य सामग्री भेजकर प्रदर्शनकारियों को समर्थन दिया, CJP प्रवक्ता अशुतोष रांका ने स्पष्ट किया कि वे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक इस स्थल से नहीं हटेंगे। सोनम वांगचुक ने अस्पताल में भर्ती रहते हुए भी अपना उपवास जारी रखा।

सोनम वांगचुक का अनशन: आंदोलन की जान
सोनम वांगचुक 28 जून 2026 से जंतर-मंतर पर अनशन पर थे। उन्होंने 20 दिनों से अधिक समय तक केवल नमक और पानी लिया और 9 किलोग्राम से अधिक वजन कम किया। डॉक्टरों ने उन्हें अत्यंत कमजोर बताया और 24 घंटे चिकित्सकीय निगरानी में रखा, 17 जुलाई 2026 को, अनशन के 21वें दिन, सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाकर अस्पताल ले जाया गया। इस दौरान CJP संस्थापक अभिजीत दीपके को भी हिरासत में लिया गया। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर उन्हें मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां से उन्होंने उपवास जारी रखा।
सोनम वांगचुक ने कहा कि जब तक शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय नहीं होती या राजनीतिक नेता उन्हें आश्वासन नहीं देते कि इस मुद्दे पर संसद में चर्चा होगी, वे उपवास जारी रखेंगे।
विपक्ष और राजनीतिक दलों का समर्थन
पुलिस कार्रवाई के बाद विपक्षी दलों ने एकजुट होकर सरकार पर निशाना साधा। 21 जुलाई को कांग्रेस, AAP, NCP(SCP), TMC, शिवसेना (UBT) और वाम दलों के नेता प्रदर्शनकारियों के समर्थन में उतरे।
कांग्रेस ने पीएम आवास का किया घेराव
कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दिया। पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया, बाद में छोड़ दिया गया।
अन्य विपक्षी दलों ने जंतर-मंतर पर दिया समर्थन
शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे जंतर-मंतर पहुंचे। एनसीपी (SCP) प्रमुख शरद पवार ने प्रदर्शन स्थल पर जाकर कहा कि छात्रों के साथ जो व्यवहार हुआ वह लोकतांत्रिक मूल्यों के योग्य नहीं है। AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने भी सोनम वांगचुक से मुलाकात की और कहा कि धर्मेंद्र प्रधान को हटाकर सोनम वांगचुक को शिक्षा मंत्री बनाया जाना चाहिए।

सरकार और ABVP का पक्ष
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने 20 जुलाई को CJP के प्रतिनिधियों से मुलाकात की। CJP प्रवक्ता सौरव दास ने कहा कि उन्हें नड्डा के आवास पर बातचीत के लिए बुलाया गया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया और कहा कि मंत्रियों को जंतर-मंतर आकर लोगों के बीच बात करनी चाहिए। CJP ने कहा कि अगर सरकार जंतर-मंतर पर बातचीत को तैयार नहीं है तो वे कंस्टीट्यूशन क्लब जैसे तटस्थ स्थान पर बातचीत के लिए तैयार हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने NDA सांसदों की बैठक में कहा कि NEET पेपर लीक में शामिल लोगों को इतनी कड़ी सजा दी जानी चाहिए कि कोई भी भविष्य में बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करने की हिम्मत न करे। उन्होंने बताया कि पेपर लीक के बाद 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया और NEET पुनर्परीक्षा प्राथमिकता के आधार पर आयोजित की गई, ABVP ने आंदोलन की निंदा की और आरोप लगाया कि असामाजिक तत्वों और राजनीतिक हस्तक्षेप ने छात्रों के आंदोलन को अपहृत कर लिया है।

देश के अन्य शहरों में भी भड़के विरोध प्रदर्शन
यह आंदोलन अब केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। इंदौर में 1000 से अधिक छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और कलाकारों ने जंतर-मंतर प्रदर्शन के समर्थन में रैली निकाली। प्रदर्शनकारियों ने NEET पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले 20 छात्रों के नाम वाले पोस्टर प्रदर्शित किए। स्थानीय लोगों ने पानी, बिस्कुट, फल और घर का बना खाना प्रदर्शनकारियों को भेजा।
CJP की तीन अटूट मांगें
CJP ने अपनी तीन मुख्य मांगें स्पष्ट की हैं। पहली मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। दूसरी मांग NEET पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा है। तीसरी मांग शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR वापस लेना और भविष्य में ऐसी FIR न दर्ज करने की गारंटी है, CJP ने हिरासत में लिए गए लोगों की सटीक संख्या मांगी है और कहा है कि वे अनुमान पर नहीं चलना चाहते, बल्कि सटीक जानकारी चाहते हैं।

दिल्ली के अलावा CJP आंदोलन कहाँ-कहाँ हो रहा है?
यह आंदोलन अब केवल दिल्ली के जंतर-मंतर तक सीमित नहीं है। यह धीरे-धीरे देश के कई बड़े शहरों में फैल चुका है। खबरों के अनुसार, CJP के समर्थन में मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु और अहमदाबाद जैसे प्रमुख महानगरों में भी प्रदर्शन हुए हैं, इसके अलावा, इंदौर में 1000 से अधिक छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों ने जंतर-मंतर आंदोलन के समर्थन में रैली निकाली।
इन शहरों में प्रदर्शनकारियों ने NEET पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों को श्रद्धांजलि दी और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर आवाज उठाई। स्थानीय लोगों ने इन प्रदर्शनों में प्रदर्शनकारियों को खाना-पानी भेजकर समर्थन दिया, हालांकि, सबसे बड़ा और केंद्रीय प्रदर्शन अभी भी दिल्ली के जंतर-मंतर पर ही जारी है, जहाँ CJP के समर्थक लगातार धरने पर बैठे हैं।

बिहार की भूमिका: NEET आंदोलन में सबसे सक्रिय राज्यों में से एक
पटना और बिहार में यह आंदोलन काफी जोरदार रहा है। दरअसल, बिहार उन राज्यों में से एक है जहाँ दिल्ली के जंतर-मंतर प्रदर्शन का सबसे गहरा असर देखने को मिला है, 21 जुलाई 2026 को पटना में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के बैनर तले सैकड़ों छात्रों ने ‘लोक भवन मार्च’ निकाला
जब प्रदर्शनकारी JP गोलंबर के पास बैरिकेड्स तोड़कर आगे बढ़ने लगे, तो पुलिस ने लाठीचार्ज, वॉटर कैनन और आंसू गैस के गोले दागे।
ध्यान देने वाली बात: फेक न्यूज़ का मामला
इस आंदोलन के दौरान एक पुराना वीडियो वायरल हुआ, जिसमें पटलिपुत्रा रेलवे स्टेशन पर 13 जून 2026 को बिहार कांस्टेबल भर्ती परीक्षा के उम्मीदवार ट्रेनों पर पत्थरबाजी करते दिखे, इस वीडियो को झूठा बताकर CJP प्रदर्शन से जोड़ दिया गया। उत्तरी रेलवे ने स्पष्ट किया कि यह वीडियो पुराना है और इसमें हाइड्रोजन ट्रेन नहीं बल्कि WAG-12 लोकोमोटिव वाली ट्रेन है।
बिहार की सक्रिय भूमिका
बिहार ने इस आंदोलन में बेहद सक्रिय भूमिका निभाई है। यहाँ के छात्र न केवल NEET पेपर लीक के खिलाफ उतरे, बल्कि दिल्ली के जंतर-मंतर आंदोलन के साथ पूरी एकजुटता दिखाई। सड़कों पर उतरे छात्रों को पुलिस बल का सामना करना पड़ा, लेकिन वे अपनी मांगों पर अड़े रहे। विधान परिषद में भी यह मुद्दा गरमाया और विपक्षी दलों ने एकजुटता दिखाई। बिहार के इस आंदोलन ने साफ कर दिया कि यह मुद्दा अब केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के युवाओं की आवाज है।

भविष्य के परिदृश्य: अब आगे क्या होगा?
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन जारी है और CJP ने सरकार के साथ बातचीत के लिए जंतर-मंतर या किसी तटस्थ स्थान पर मिलने की बात कही है, लेकिन सरकारी आवास पर बातचीत से इनकार कर दिया है।
• विशेषज्ञों के अनुसार, इस आंदोलन का भविष्य कई बातों पर निर्भर करता है।
• पहला, सरकार की प्रतिक्रिया – क्या सरकार CJP की मांगों को गंभीरता से लेगी या कड़ा रुख अपनाएगी?
• दूसरा, विपक्षी एकता – क्या विपक्षी दल इस मुद्दे पर एकजुट रहेंगे?
• तीसरा, आम जनता का समर्थन – जब तक छात्र और आम जनता इस आंदोलन से जुड़े रहेंगे, सरकार के लिए इसे अनदेखा करना मुश्किल होगा।
• संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा की कार्यवाही दो बार स्थगित हुई क्योंकि विपक्ष ने पुलिस बैटनचार्ज के मुद्दे पर सरकार को घेरा।
• यह आंदोलन भारतीय लोकतंत्र, शिक्षा व्यवस्था और युवा राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। NEET पेपर लीक और शिक्षा सुधारों का मुद्दा अब भारतीय राजनीति के केंद्र में आ चुका है।

इस आंदोलन में नुकसान किसको हुआ? सरकार को या छात्रों को?
इस आंदोलन में नुकसान दोनों पक्षों को हुआ है, लेकिन नुकसान की प्रकृति और गंभीरता में बहुत अंतर है। छात्रों को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक नुकसान हुआ है, जबकि सरकार को राजनीतिक और प्रतिष्ठा का नुकसान हुआ है। आइए दोनों पक्षों को विस्तार से समझते हैं।
छात्रों को हुआ नुकसान (सबसे बड़ा नुकसान)
20 जुलाई 2026 को ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और वॉटर कैनन का इस्तेमाल किया। इस हिंसक झड़प में 60 से अधिक प्रदर्शनकारी घायल हुए। कुछ प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हुए, एक युवक के सिर से बुरी तरह खून बह रहा था, एक छात्र का पैर टूट गया। कई महिला छात्राओं के साथ भी मारपीट की गई और उनके कपड़े फाड़े गए।
राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल में अकेले 65 मेडिको-लीगल केस दर्ज किए गए। पुलिस ने 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया।
जान का नुकसान – आत्महत्याएं
NEET पेपर लीक के कारण 20 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की है। CJP ने इन परिवारों को 1 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग की है। यह नुकसान अपूरणीय है, एक छात्रा रिया कुमारी थापा के पिता, जो एक सेना के वयोवृद्ध हैं, ने स्वयं जंतर-मंतर जाकर आंदोलन का समर्थन किया ताकि किसी और परिवार को यह दुख न झेलना पड़े।
मानसिक और भावनात्मक नुकसान
महीनों की मेहनत, बड़े सपने और परिवार का निवेश, सब कुछ पेपर लीक के कारण अधर में लटक गया। छात्रों को अनिश्चितता, तनाव और निराशा झेलनी पड़ी। कई छात्रों ने अपनी पढ़ाई का एक साल बर्बाद होते देखा। CJP नेता अभिजीत दीपके ने कहा कि “छात्रों की जान दांव पर लगी है।
नेतृत्व में विश्वासघात का अहसास
20 जुलाई को जब हजारों छात्र सड़कों पर उतरे, तब CJP का कोई नेता मौके पर मौजूद नहीं था। एक छात्रा ने बताया कि भीड़ के बीच कोई निर्देश नहीं थे, कोई संचार नहीं था। CJP संस्थापक अभिजीत दीपके खुद उस दिन अनशन तोड़ चुके थे। इससे छात्रों को नेतृत्व पर विश्वासघात का अहसास हुआ।

सरकार को हुआ नुकसान (राजनीतिक और प्रतिष्ठा का)
इस आंदोलन ने विपक्षी दलों को एकजुट कर दिया। कांग्रेस, AAP, शिवसेना (UBT), NCP (SCP) और वाम दलों ने एक साथ सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। 21 जुलाई को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दिया।
संसद की कार्यवाही ठप
NEET मुद्दे के कारण लोकसभा चार बार स्थगित हुई और राज्यसभा की कार्यवाही भी बाधित हुई। विपक्ष ने लगातार सरकार को घेरा और ‘शेम-शेम’ के नारे लगाए।
अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में छवि खराब
न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट और BBC ने इस आंदोलन को कवर किया। BBC ने इसे “मोदी सरकार के खिलाफ हाल के वर्षों में सार्वजनिक असंतोष की सबसे दृश्य अभिव्यक्तियों में से एक बताया। वॉशिंगटन पोस्ट ने इसे “प्रधानमंत्री मोदी की सरकार के लिए एक दुर्लभ सार्वजनिक चुनौती करार दिया।
पुलिस की छवि पर असर
पुलिस कार्रवाई के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें पुलिस को महिला छात्राओं और युवकों पर लाठियां बरसाते देखा गया। इससे दिल्ली पुलिस की छवि को गहरा नुकसान हुआ। विपक्ष ने इसे “पुलिस बर्बरता” करार दिया।
सरकार की ‘जवाबदेही’ पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पेपर लीक के लिए किसी को जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया गया?। राहुल गांधी ने कहा कि 152 पेपर लीक हुए, 7.5 करोड़ छात्र प्रभावित हुए, लेकिन एक भी दोषी को सजा नहीं मिली। जबकि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ 5 आपराधिक मामले दर्ज किए गए।
पुलिसकर्मी भी घायल
पुलिस के अनुसार, इस झड़प में 118 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें 6-7 गंभीर रूप से घायल हुए। 15-20 सरकारी वाहनों को भी नुकसान पहुंचा।
दोनों पक्षों के नुकसान की तुलना
शारीरिक नुकसान की बात करें तो छात्रों में 70 से अधिक घायल हुए और कई को हिरासत में लिया गया, जबकि सरकारी पक्ष में 118 पुलिसकर्मी घायल हुए और कई सरकारी वाहन क्षतिग्रस्त हुए।
जान का नुकसान केवल छात्रों को हुआ है, 20 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की, जबकि सरकारी पक्ष में कोई जान नहीं गई।
मानसिक और भावनात्मक स्तर पर छात्रों को गहरा आघात झेलना पड़ा, उनके वर्षों की मेहनत बर्बाद हुई। सरकार को राजनीतिक दबाव और चिंता का सामना करना पड़ा।
प्रतिष्ठा के मामले में छात्रों को कोई नुकसान नहीं हुआ, जबकि सरकार की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि खराब हुई।
राजनीतिक दृष्टि से छात्रों को कोई नुकसान नहीं हुआ, जबकि सरकार को विपक्ष के एकजुट होने और संसद ठप होने का सामना करना पड़ा।
भविष्य पर प्रभाव की बात करें तो छात्रों का भविष्य अनिश्चित हो गया और उनका एक साल बर्बाद हुआ, जबकि सरकार को आने वाले चुनावों में इसका असर झेलना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का क्या कहना है?
टाइम्स नाउ के एक ऑप-एड के अनुसार, सरकार ने जल्दी तो काम किया, लेकिन कभी छात्रों की ओर नहीं। जबकि राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं को पीएम आवास के बाहर धरना देने पर 20 मिनट के भीतर सरकारी अधिकारी भेजे गए, लेकिन एक महीने तक छात्रों के पास कोई नहीं गया।
द प्रिंट के अनुसार, यह आंदोलन अब CJP के नियंत्रण से बाहर हो गया है और यह एक जैविक, बिना नेता वाला युवा आंदोलन बनता जा रहा है। इसका मतलब यह है कि सरकार के लिए स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
जंतर-मंतर पर चल रहा यह प्रदर्शन केवल एक आंदोलन नहीं है; यह भारत के लाखों युवाओं की पीड़ा, आक्रोश और उम्मीद का प्रतीक है। यह आंदोलन सरकार को यह संदेश दे रहा है कि भारत का युवा अब अपने अधिकारों के लिए खामोश नहीं रहेगा और वह न्याय और पारदर्शिता की मांग करेगा। चाहे सरकार कितनी भी ताकत का प्रदर्शन कर ले, लेकिन जब तक छात्रों की मांगें पूरी नहीं होतीं, यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस बढ़ते जनदबाव के सामने झुकती है या फिर और सख्त कदम उठाती है। इतिहास गवाह है कि भारत के युवाओं ने जब भी कोई आंदोलन किया है, उसे सफलता जरूर मिली है, चाहे वह 1974 का छात्र आंदोलन हो, या 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन, या 2020-21 के किसान आंदोलन। उम्मीद है कि NEET पेपर लीक और शिक्षा सुधारों के इस आंदोलन को भी न्याय मिलेगा और भारत की शिक्षा प्रणाली में सकारात्मक बदलाव आएगा। जंतर-मंतर पर गूंजती युवाओं की आवाज जल्द ही संसद में भी सुनाई दे, यही देशवासियों की उम्मीद है।







